सितंबर 02, 2010

वीरेन्द्र सहवाग को कप्तानी क्यों नहीं ???

विश्व क्रिकेट में अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी के कारण शोहरत के शिखर का आरोहण करने वाले मुल्तान के सुल्तान के नाम से प्रसिद्ध भारतीय ओपनर बल्लेबाज वीरेन्द्र सहवाग के नेतृत्व में ही भारत को अगला विश्व कप खेलना चाहिए। गौरतलब है कि हाल ही में श्रीलंका में सम्पन्न त्रिकोणीय वन-डे श्रृंखला व टेस्ट सीरिज दोनो में ही सहवाग ने मैन आफ द सीरिज का खिताब हासिल किया।
वे दो बार 2008 व 2009 में विज्डन लीडिंग क्रिकेटर आफ द इयर हासिल कर चुके हैं। विपक्षी टीम के गेंदबाज पर पहली ही गेंद से अपने आक्रामक प्रहार से हावी होने वाले सहवाग विश्व क्रिकेट में अपना लोहा मनवा चुके हैं। वन-डे में 13 शतकों, 36 अर्धशतकों के अतिरिक्त वीरू ने 92 विकेट भी हासिल कर अपनी आल राउण्डर प्रतिभा का बखूबी प्रदर्शन किया है। वर्तमान में सहवाग वन-डे रेकिंग में 8वें स्थान पर काबिज है।
पिछले वर्ष टेस्ट मैच में भी सहवाग का स्ट्राइक रेट 100 से अधिक रहा है व 290 रन तीन बार से अधिक बनाने वाले टेस्ट क्रिकेट में विश्व के एकमात्र बल्लेबाज हैं। टी-20 व वन-डे में तो सहवाग के आक्रामक प्रहार दर्शनीय होते ही है, बल्कि टेस्ट में भी सहवाग जब बल्लेबाजी कर रहे होते हैं तो भी दर्शकों को वैसा ही आनन्द आता है व यही कारण है कि 278 गेंदों में सबसे तेज तिहरा शतक लगाने रिकार्ड सहवाग के नाम दर्ज है।
अभी वे अपनी फार्म के यौवन पर है अतः उनके अनुभव, टीम को शुरूआत से ही नेतृत्व देने की बेहतरीन योग्यता व मैच विजेता पारी खेलने के हुनर के बुते उन्हे ही टीम इंडिया की कप्तानी सोंपनी चाहिए ताकि भारत वन-डे विश्व कप को दूसरी बार अपनी झोली में डाल सके।

अगस्त 01, 2010

कौन चीखता है तेरे जुल्मतों भरे हिसारों से।

समझ ना सका मैं तेरे दर पर लगी कतारों से,
रोनी की उम्मीद कर बैठा गर्दिमय सितारों से।

हमसफर ही तंग दिल मिला था मुझको,
किस कदर फरीयाद करता मैं इन बहारों से।

कौन रूकेगा इस सरनंगू जर के नीचे,
जो खुद टिका हो बेजान इन सहारों से।

आंखों के आब को अजान देते रहते हैं जो,
लम्हा-लम्हा मांगता रहा समर इन रेगजारों से।

नामो-निशां भी मिटा चुका हूं तेरा इस दिल से,
तो किस कदर गुजरू तेरे दर के रहगुजारों से।

मेरी चाहत तो खला में खो चुकी है अब,
वक्त गुजर रहा है हर्ष इन शुमारों से।

तुम्हारी खुशी का सीना किसने चीरा दिलावर,
कौन चीखता है तेरे जुल्मतों भरे हिसारों से।

जनवरी 26, 2010

भारत देश में “खेल-क्रान्ति” आखिर कब आयेगी ???











विश्व की जनसंख्या में द्वितीय स्थान व क्षेत्रफल के लिहाज से सातवां स्थान रखने वाले देश भारत का पदक तालिका के अनुसार २००८ बीजिंग ओलम्पिक खेलों में ५०वां, २००६ दोहा एशियन खेलों में ९वां व २००६ राष्ट्रमण्डल खेलों में भी ४था स्थान प्राप्त करना निश्चित ही देश की खेलों के प्रति जागरूकता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। आखिर ऐसी क्या सुविधाएं हैं जो हम अपने खेलों को उपलब्ध नहीं करा सकते हैं ? क्या देश में प्रतिभाओं की कमी है या फिर हम अपने देश को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति नहीं दिलाना चाहते हैं। प्रत्येक भारतवासी की यह ख्वाहिश है कि ओलम्पिक में जिस प्रकार से तिरंगा सबसे ऊपर आसीन था व राष्ट्र-गान के बाद अभिनव बिन्द्रा के गले में गोल्ड मेडल पहनाया गया, ऐसे सुखद और गोरवान्वित करने वाले दृश्य बार-बार देखे।
      पर ऐसा इस विशाल देश के खेल प्रेमियों को बहुत ही कम देखने को नसीब हुआ है और होता यही है कि प्रत्येक अन्तर्राष्ट्रीय खेल आयोजन के बाद शर्मनाक व खेदजनक प्रदर्शन की आलोचना हेतु प्रिन्ट मिडिया, इलेक्ट्रोनिक मिडिया व संसद में असफलता के आरोप-प्रत्यारोप लगने शुरू हो जाते हैं। कहीं पर सरकार की खेल नीति का दोष, कहीं खेल संगठनों का दोष, तो कहीं पर कोच व खिलाङियों को भी निशाना बनाया जाता है। यदि इस ऊर्जा को हम सकारात्मक रूप से खेल आयोजन से पहले इस्तेमाल करें व पूर्व में ही खेलों की समालोचना, सूक्ष्म अन्वेषण व गहन शोध कर खिलाङियों में राष्ट्रीय गौरव व राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के लिए खेलने जैसी भावनाओं का उदय किया जाये व खिलाङियों को वांछित सम्मान दिलायें तो निश्चित ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ये खिलाङी तिरंगे की शान बढायेंगे।
      देश के खेल मन्त्रालय, खेल नीतिकार, खेल प्रशासक व मिडिया जगत को खेल ढांचे में आमूल चूल परिवर्तन करना होगा तथा ये आमूल चूल परिवर्तन तब ही आ सकता है जब जिला स्तर, राज्य स्तर व राष्ट्रीय स्तर पर खेलों के चयन में होने वाली धांधलेबाजी को रोक कर उभरती हुई युवा प्रतिभाओं को समुचित अवसर दिया जाए। खिलाङियों का शोषण बन्द हो व आर्थिक दृष्टि से पिछङे हुए खिलाङियों को आर्थिक मदद दी जाए या उन्हे रोजगार उपलब्ध करवाया जाए, तभी ये खिलाङी चिन्तामुक्त होकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर पायेंगे। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने पर सरकार द्वारा दी जाने वाली इनामी राशि बढायी जाए। नयी खेल नीति बनाकर राजनीतिज्ञ का खेलों से हस्तक्षेप हटा दिया जाए। इस प्रकार का सकारात्मक रवैया व ठोस कदम उठा कर ही देश में कोई ”खेल क्रान्ति” लायी जा सकती है व इस क्रान्ति की प्रथम परख अक्टूबर-२०१० राष्ट्रमण्डल खेल, नई दिल्ली में हो जायेगी। फिर पूरा देश नवम्बर-२०१० गुआंगजौ एशियन खेल व लंदन-२०१२ ओलम्पिक खेल पर पदक तालिका में भारत का स्थान ऊँचा होने का बेसब्री से इंतजार कर रहा है।

      वास्तव में यदि सही प्रतिभा का चयन, कुशल प्रशिक्षण, दृढ निश्चय व देश के लिए कुछ करने की तमन्ना हो तो वो दिन दूर नहीं जब भारत में अनेक अभिनव बिन्द्रा, राज्यवर्द्धन सिंह, लिएन्डर पेस, विजेन्द्र कुमार, कर्णम मल्लेश्वरी व सुशील कुमार सरीखे युवा खिलाङी अपने उत्कृष्ट खेल प्रदर्शन से देश को और भी अधिक गोरवान्वित करेंगे।
      वास्तव में यदि सही प्रतिभा का चयन, कुशल प्रशिक्षण, दृढ निश्चय व देश के लिए कुछ करने की तमन्ना हो तो वो दिन दूर नहीं जब भारत में अनेक अभिनव बिन्द्रा, राज्यवर्द्धन सिंह, लिएन्डर पेस, विजेन्द्र कुमार, कर्णम मल्लेश्वरी व सुशील कुमार सरीखे युवा खिलाङी अपने उत्कृष्ट खेल प्रदर्शन से देश को और भी अधिक गोरवान्वित करेंगे।

जनवरी 16, 2010

तोङने में हार है, प्रेम के पथिक की, जोङना ही जीत का आगाज होता है।




परिवर्तन वक्त का मिजाज होता है,
यह हर सम्बन्ध का हमराज होता है।

जहाँ को देता है मीठी सुर लहरी,
जब अंतस् से दर्दीला साज होता है।


मन को लुभाता है तितली-सा बहकना,
पर उसूलों से बंधा बाज होता है।


सहता है नदी का वियोग वो हर पल,
उस पर्वत की अडिगता पर नाज होता है।

तोङने में हार है, प्रेम के पथिक की,
जोङना ही जीत का आगाज होता है।

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