जनवरी 16, 2010

तोङने में हार है, प्रेम के पथिक की, जोङना ही जीत का आगाज होता है।




परिवर्तन वक्त का मिजाज होता है,
यह हर सम्बन्ध का हमराज होता है।

जहाँ को देता है मीठी सुर लहरी,
जब अंतस् से दर्दीला साज होता है।


मन को लुभाता है तितली-सा बहकना,
पर उसूलों से बंधा बाज होता है।


सहता है नदी का वियोग वो हर पल,
उस पर्वत की अडिगता पर नाज होता है।

तोङने में हार है, प्रेम के पथिक की,
जोङना ही जीत का आगाज होता है।

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

वाह!! बहुत बढ़िया!

संगीता पुरी ने कहा…

सुंदर भाव .. बहुत बढिया रचना !!

अनुनाद सिंह ने कहा…

आपका हिन्दी चिट्ठाकारी में स्वागत है।

लगता है कि आपको ड़ टाइप करने में असुविधा हो रही है जिसके कारण आप उसके जगह पर ङ टाइप कर दे रहे हैं।

हिन्दी लिखने के लिये आप कौन सा प्रोग्राम प्रयोग में लाते हैं? किसी हिन्दी चर्चा समूह (जैसे चिट्ठाकार) पर आप अपनी समस्या क्यों नहीं रखते?

यह ब्लॉग खोजें